Friday, October 10, 2014

मैं मस्ती के संग बहती हूँ

भागती हुई नदी से पूछा मैंने --

क्यों  अपना अस्तित्व मिटाती हो ?
जब देखो सागर से मिलने वेवजह चली जाती हो 
आँखों में गहरा राज़ लिए नदी मुस्कुराई 
प्रकृति की विचित्रताएं भला आज तक किसी को समझ में आई ?
सागर से मिलकर मैं अपना भार हल्का कर  आती हूँ 
बनी रहूँ नदी हमेशा इसीलिए चली जाती हूँ 
जाकर सागर मैं अपना अस्तित्व सुरक्षित कर आती हूँ 
भागकर मिलती उससे पर उड़कर चली आती हूँ 
ताल-तलैया -दरिया सभी को प्यार का राग सिखाती हूँ 
भूले -भटके राहगीरों के प्यास की आग बुझाती हूँ 
अनजाने -पथ पर चल कर मैं गीत मिलन के गाती हूँ 
हूँ अकेली कहने को पर-- साथ सभी के रहती हूँ 
कल-कल निनाद करते-करते मैं ----
मस्ती के संग  बहती हूँ --मैं मस्ती के संग  बहती हूँ। 

13 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (11-10-2014) को पथिक हूँ मैं (चर्चा मंच: 1763) पर भी है !
    --
    सौभाग्य और सुहाग की प्रतीक
    करवाचौथ की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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    1. धन्यवाद शास्त्री जी ...

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  2. प्रश्नोत्तर सहित सुन्दर कविता ।

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  3. नदि और सागर के प्रेम की रहिस्यमय पंक्तियाँ
    अतिसुन्दर और मन को भाने वाली अनुभुति
    आभार
    मेरी कुछ पंक्तियाँ जब भी आती मुसिबत अक्सर करते हैँ माँ को याद पढ़े और अपनी राय देँ।

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  4. आखिर एक नदी का स्मपुर्ण समपर्पण अपने सागर के लिए ही तो है, बास संग चलते पथिकों का कुछ समय साथ मिल जाता है. अत्यंत सुन्दर कविता :)

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  5. कल 12/अक्तूबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  6. धन्यवाद यशवंत जी ....

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  7. बहुत सुन्दर भाव लिए प्रस्तुति |
    आशा

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  8. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ...अच्छी रचना

    आप मेरे ब्लॉग पर आमंत्रित  हैं. :)

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  9. बहुत सुंदर प्रस्‍तुति‍

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  10. अच्छी प्रस्तुति !

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