Monday, February 13, 2012

मुर्गा बोला (भाग-४)

ब्लौगर साथीओं आज  मुर्गा -मुर्गी के वियोग व प्रेम की व्यथा का आनंद लीजिये ........
मुर्गा बोला..........
कुकड़ू  कु .......
 मेरी हमसफर .....मेरी हमदम ......
कहाँ हो तुम?????????????......
मुद्दतें गुजर गईं 
तुम नहीं आईं.....
कैसे बताउं तेरे बिन ....
डंसती है ये तन्हाई .

आओगी .....तुम .....ये सोचकर ....
तन्हा यहीं  खड़ा हूँ ....
जिस मोड़ पे मुझे छोड़ गईं थीं ?
बेबस वहीं पड़ा हूँ ......

जिउं......? वो भी तुम बिन ...? नहीं .........
मेरे दिल को नही गवारा ........
मुर्गी रानी मान भी जाओ ....
तुम बिन मेरा कौन सहारा ?

मुर्गी बोली ......
मुद्दतें गुजर गईं 
तुम्हें  भूल नही पाई.......
वियोग की अग्नि को ...
दहका गई पुरवाई .

कैसे जिउं तुम बिन ?
तुम बिन कैसे मै गाऊ ?
पांव पड़ी जंजीर है मेरे ....
कैसे मिलने आऊं....?

भौरा  गुंजन करता था ......
कलियाँ खिलखिलाती थी ....
तितली बनकर  जब-जब मै ....
उपवन में लहराती थी .

हाय ! ये क्या हो गया .....?
कैसे हो गया .......?
फूल झड गये सारे!
उस निर्दय पतझड़ के आगे ......
लूट गईं बहारें......!

 नहीं रोक सकेंगे मुझको ......
करे लाख जतन जग सारा ....
मुर्गे राजा ....मुझको चाहिए 
केवल औ केवल साथ तुम्हारा ....




32 comments:

  1. ये उम्दा पोस्ट पढ़कर बहुत सुखद लगा!
    प्रेम दिवस की बधाई हो!

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  2. अरे बड़े दिनों में बोला आपका मुर्गा.....
    :-)

    मगर बोला तो बड़ा मीठा बोला...
    शुभकामनाएँ...

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  3. अरे रे, इधर हम कबूतरों के संयोग से और उधर आपके मुर्गी-मुर्गा वियोग से पीड़ित है!!

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  4. अच्छी बाल कविता.

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  5. बड़े दिन बाद फिर मुर्गा सीरिज आया।
    रोचक !

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  6. मुर्गे-मुर्गी बाकी सब बातें करते हैं-सिवाए अपने कटने की। ठीक आदमी जैसे!
    (वर्ड वेरिफिकेशन तत्काल हटाएं। अन्यथा दुबारा लौटना संभव न होगा)

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  7. क्या बात है निशा जी.
    मुर्गा मुर्गी के बहाने किस की कहानी ब्यान की है आपने.
    सुन्दर है आपकी प्रस्तुति.
    पर बिचारे मुर्गे की तो शामत आई
    उसकी जिंदगी किसी की चिकन करी में काम आई.
    फिर एक रोज मुर्गी की भी शामत आई.
    न जाने कितने मुर्गे मुर्गियों का जीवन बनता है यूँ ही रुसवाई.
    रहम की भीख माँगते हैं हमसे,न दीजिए इनको यूँ जुदाई.

    माफ कीजियेगा मुझे ,निशा जी ,आपकी सुन्दर कविता में क्या मेरी
    तुकबंदी आपको पसंद आई.

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  8. मुर्गा मुर्गी की कथा के माध्यम से
    जीवन की किन्हीं परिस्थितियों का वर्णन भी हो गया है
    रोचक काव्य !!

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  9. बहुत ही सुन्दर कविता , वह भी चित्र के साथ ! खुली व्यंग ! आखिर हम कब मुक्त है ?

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  10. मुर्गे राजा ....मुझको चाहिए
    केवल औ केवल साथ तुम्हारा .

    काव्य कथा श्रृंखला के माध्यम से जिंदगी के विभिन्न दृश्य दिखला रहीं हैं आप

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  11. आपकी यह मुर्गा-मुर्गी श्रृंखला मुझे बहुत पसंद आती है।

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  12. बहुत शानदार पोस्ट!

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  13. प्रस्तुति अच्छी लगी । मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

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  14. simple and soft way of expression always better than spiral way .i personaly like the way.thanks keep it.

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  15. इस शानदार विषय के लिए आपकी सोच को सलाम करने को जी चाहता है।
    ------
    ..की-बोर्ड वाली औरतें।
    मूस जी मुस्‍टंडा...

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  16. मनोरंजक है ...
    रंगोत्सव पर शुभकामनायें निशा जी !

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  17. बहुत उम्दा लिखा है आप ने ,अच्छा लगा पढ़कर :)

    आप को होली की खूब सारी शुभकामनाएं

    नए ब्लॉग पर आप सादर आमंत्रित है

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  18. Replies
    1. बहुत सुन्दर सृजन, बधाई.

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  19. murga murgi ki vyatha ko kya khoobsorati se bayaan kiya hai aapne...waah....aapka follower bann gaya hoon to ab aata rahunga!! aap bhee aana zaari rakhiyega!!

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  20. मुर्गा मुर्गी का प्रतीक बात कहने के ढंग को असरदार और सहज बना देता है .आइन्दा घर की मुर्गी को दाल बराबर न समझा जाए .मुर्गे को बोस न समझा जाए .

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  21. आपकी अन्य रचनाओं को पढ़े बिना इस कविता को समझना कठिन है. इस रचना के पीछे की पीड़ा मार्मिक है.

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  22. बहुत ही अच्छी कविता है

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