Friday, October 18, 2013

गोरी तेरा रूप जैसे

गोरी तेरा रूप जैसे 
सुबह-सुबह की धूप
तुम्हारी ये  चंचल शोखियाँ 
दिल पे गिराती बिजलियाँ ....


तुम्हारी हँसी की खनक 
तुम्हारा मनमोहक जोश 
दिल मेरा फिसल गया 
किसे दूँ मै  दोष ?

18 comments:

  1. कहीं पढ़ी हुई पंक्तियाँ याद आ गईं।
    सावन मास की धूप सा गोरी तेरा रूप सलोना
    कर जाता है रोशन मेरे मन का कोना कोना

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  2. वाह वाह
    बहुत खूब.

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  3. अच्छी प्रस्तुति।...
    शरदपूर्णिमा आ गयी, लेकर यह सन्देश।
    तन-मन, आँगन-गेह का, करो स्वच्छ परिवेश।।
    ...सुप्रभात..। आपका दिन मंगलमय हो।

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  4. नमस्कार आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (20-10-2013) के चर्चामंच - 1404 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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    1. धन्यवाद अरुण जी ....

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  5. गोरी तेरा रूप जैसे
    सुबह-सुबह की धूप

    तुझसे उपमा ही तेरी ,

    तेरा रूप अनूप .

    सुन्दर अभिव्यक्ति .

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  6. वाह !! एक अलग अंदाज़ कि रचना ......बहुत खूब

    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद

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  7. बहुत सुन्दर शब्द ... दिल तो फिसलना ही है ...

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  8. बहुत सुन्दर,सुन्दर अभिव्यक्ति.

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