Tuesday, July 1, 2014

उनको मेरा सलाम

बहुत दिनों के बाद थोड़ी सी राहत मिली है.सोचा इस पल को यादगार बना लूँ  …२९ दिसम्बर २०१३ की रात  में देखे गए सपने की झलक को  २९ जून २०१४ में वास्तविक रूप में घटते  देखा,,,, कोई माने या न माने ,,,,पर मैं मान गई.… मेरे उसी सपने को समर्पित है मेरे दिल के ये उदगार ------

अपने-अपने स्वार्थ की खातिर 
सही राह से भटका देते हैं 
सपना ---सपने में आकर 
मुझे राह दिखलाते हैं ----

नहीं चाहिए ऐसे अपने 
नहीं चाहिए कोई नाम 
मेरे अपने सपने हैं 
उनको मेरा सलाम ------
    


12 comments:

  1. सुंदर अभिव्यक्ति

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  2. बेहद उम्दा और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@दर्द दिलों के
    नयी पोस्ट@बड़ी दूर से आये हैं

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  3. होता है कई बार ... अपनों की जैलिसी काम बिगाड़ देती है पर सही राह मिल जाए तो और क्या चाहिए ....

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  4. बहुत सुन्दर...

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  5. बहुत सुंदर रचना , मंगलकामनाएं आपको !

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  6. Salam hamara bhi, apke sapno ko!

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  7. मेरी तरफ से भी सलाम

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