Tuesday, May 13, 2014

बनाना चाहो तो

बनाना चाहो तो 
बिगड़ जाता है 
चाँद चाँदनी की 
 हर कोशिश पे 
खिलखिलाता है 
क्या हुआ  जो
रास्ते पे चट्टान 
आ गिरी 
चट्टान से बचकर 
निकलना मुझे आता है 
बिना कुछ कहे चाँदनी 
खिलखिलाती है 
हो परिपूर्ण बुलंद हौसले से 
चाँद से नज़रें मिलाती है 
उबड़-खाबड़ रास्तों पे 
रहती सबसे हिल-मिल 
लहरों के रथ पे हो सवार 
करती रहती झिलमिल 





19 comments:

  1. मैडम जी, बहुत दिनों बाद दर्शन हुए....कहीं चाँद वांद पर तो नहीं चली गयी थी सैर सपाटे को!!
    खैर, लौटे तो बढ़िया कविता ले कर...

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    1. लौटी नहीं थी सर यात्रा के बीच कहीं मौका मिल गया था ...प्रेरित करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ....

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (14-05-2014) को "आया वापस घूमकर, देशाटन का दौर" (चर्चा मंच-1612) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. धन्यवाद शास्त्री जी ......

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन एक्सिडेंट हो गया ... रब्बा ... रब्बा - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. सुन्दर प्रस्तुति..

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  5. बहुत खूब ... लहरों के रथ पर सवार जीने की आशा लिए चांदनी ...

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  6. बहुत बढ़िया प्रस्तुति..

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  7. बहुत बढ़िया प्रस्तुति !!

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  8. बहुत सुन्दर रचना .......

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  9. उबड़-खाबड़ रास्तों पे
    रहती सबसे हिल-मिल
    लहरों के रथ पे हो सवार
    करती रहती झिलमिल
    ये चांदनी की खासियत है, पर उसका होना तो चांद से है।

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  10. ये गुण चांदनी के नसीब में ही हैं...

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  11. सुन्दर।
    बनाना चाहो तो
    बिगड़ जाता है
    चाँद चाँदनी की
    हर कोशिश पे
    खिलखिलाता है

    क्या खूब कहा है !

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