Friday, August 15, 2014

यादें तेरी गलियाँ

यादें तेरी गलियाँ
जब,जबरन मानस पे  छाती है
उखड़ा-उखड़ा दिल रहता है
आँखें छलक जाती है,,,,,,,

अपनों का नेह
वो निश्छल स्नेह
वो ममता की छाया
किसने चुराया ?


छोटी-छोटी बातें हैं
रहस्य है गम्भीर
हँसकर जिसने इनको झेला
उसे कहते हैं वीर,,,,,,,



विचित्रताओं की दुनिया  है
अपनों में  अपना है कौन ?
हर  पल दिल उन्हें ढूँढता
प्रकृति भी है मौन,,,,,,






7 comments:

  1. ऐसी वीरान जगह अकेले जाती क्यों हो, मैडम जी ....यादें पीछे नहीं पड़ेंगी तो और क्या होगा?

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    1. अकेली नहीं थी सर ....पतिदेव साथ में थे ....पर भावनाओं की अभिवयक्ति अकेले में ही होती है न ? जिनका साया सिर
      से उठ गया उनकी यादें सताती है ....बहुत सारे भुक्तभोगी होंगे उनको हिम्मत बंधाने का प्रयास मात्र है मेरी ये रचना ...

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  2. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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  3. सार्थक प्रस्तुति...

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  4. कभी नहीं भूलती ये गलियाँ ...

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