Wednesday, September 9, 2015

खण्डहर वो

सहमा-सहमा रहता था वो 
तन्हा-तन्हा रहता था वो 
मुझसे कुछ-कुछ कहता था वो 
रात अमावस  की हो या 
निशा वो चाँद सितारों वाली 
स्वर्ण -रश्मियाँ करती थी 
अनवरत उसकी रखवाली 
मौसम अब खुशगवार हो गया 
खण्डहर वो आबाद हो गया ----

10 comments:

  1. Badhai...khandhar ki kismat jaag uthi!

    ReplyDelete
  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (11.09.2015) को "सिर्फ कथनी ही नही, करनी भी "(चर्चा अंक-2095) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद राजेंद्र जी .

      Delete
  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, परमवीरों को समर्पित १० सितंबर - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  4. खंडहर आबाद हो गया ,अच्छा हुआ !

    ReplyDelete
  5. मौसम के बदलाव से क्या कुछ हो जाता है ...

    ReplyDelete