Tuesday, March 4, 2014

बड़े अच्छे लगते हो---

न जाने क्यों तरसते हो 
रह-रह कर मचलते हो 
कभी कटु कभी मृदु 
कौतूहल से भरपूर सत्य ---तुम---
बड़े अच्छे लगते हो---

दुनियाँ आनी -जानी है 
हर शख्स की  अजब कहानी है 
पल-पल बदलते मौसम में 
अटल -अविचल रहते हो 
जिसे  चाहिए जैसा हिस्सा 
वैसा उसे दे देते हो 
सत्य तुम बड़े सच्चे हो -----

विचित्रताओं के हमराज़ 
खुशियों के सरताज़ सत्य ---तुम ---
बड़े अच्छे लगते हो ----

जीवन के हरेक  पड़ाव में 
तेरे साये के शीतल छाँह में 
मैंने जीना सीख लिया है 
क्या बताऊँ ! तेरे संग कैसे 
खुद को मैंने जीत लिया है 
 आगे के जीवन में भी 
संग हमेशा रहना 
बनकर निर्झर निर्मल जल का 
बूँद -बूँद बरसना 
हंसी-ठिठोली करते तुम 
प्यारे से बच्चे लगते हो 
सपनों के सृजक सत्य --तुम--
बड़े अच्छे लगते हो --

   ब्लॉगर साथियों नेट की आँख -मिचौनी की  वजह से १ मार्च के लिय़े लिखी गई रचना को आज पोस्ट कर रही हूँ। सत्य  और उसकी सच्चाई के साथ मेरे जीवन के अनुभवों का निचोड़ है इसमें -----

8 comments:

  1. बहुत प्यारी अभिव्यक्ति है.....

    सस्नेह
    अनु

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  2. बहुत सुंदर यथार्थ भाव

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  3. प्यारा अनुभव
    खूबसूरत अभिव्यक्ति

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  4. बहुत सुन्दर ........दिल से निकली रचना .....

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (05-03-2014) को माते मत वाले मगर, नेता नातेदार-चर्चा मंच 1542 में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. धन्यवाद शास्त्री जी ....

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  6. सत्य ही शिव है सत्य ही सुंदर है... तो अच्छे तो लगेंगे ही ....सुंदर अभिव्यक्ति ...!

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  7. सुंदर रचना...

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