Friday, March 28, 2014

ओ पलाश

चम-चम -चम चमकते हो 
अग्नि जैसे दहकते हो 
उमंग-उल्लास या फिर 
जो है उसमें संतुष्ट रहने की  चाह 
नहीं किसी से कोई आस 
क्या वजह है तेरी खुशियों की ?
                              बता दे मुझको ओ पलाश -----
मौसम-मस्ती और तन्हाई 
लिए साथ में खुशियाँ आईं 
सौंन्दर्यविहीन वसुंधरा पे 
भाव -विभोर हो जाते हो -----

पथभ्रष्ट  मुसाफिर को 
ये मूलमंत्र बतला देना 
जो दिया है उसको प्रकृति ने 
उसमें जीना उसे सिखा देना 
मेरे,उसके,सबके मन में------
                       ओ पलाश तुम छा जाना--
                        ओ पलाश तुम छा जाना----

16 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन सब 'ओके' है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete
  2. सुन्दर तादात्म्य और संवाद प्रकृति नटी संग

    ReplyDelete
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (29-03-2014) को "कोई तो" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1566 "अद्यतन लिंक" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद शास्त्री जी ...

      Delete
  4. बहुत सुंदर बात
    सार्थक अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  5. प्यारा पलाश !! सुंदर !!

    ReplyDelete
  6. ओ पलाश .. बहुत ही सुन्दर भावावियक्ति..

    ReplyDelete
  7. बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  8. पलाश कि प्राकृति को बाखूबी उकेरा है रचना में ... बहुत सुन्दर ..

    ReplyDelete
  9. सुन्दर प्रस्तुति
    मेरे ब्लॉग पर आकर अपने सुझाव दे !

    ReplyDelete
  10. मन के दार्शनिक पष्ठभूमि में लिखी गई कविता बेहद अच्छी लगी। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा।

    ReplyDelete
  11. Really we have so much to learn from nature:)

    ReplyDelete