Saturday, August 11, 2012

वक्त

वक्त के साथ बदलना मैंने सीखा  नहीं
ऐसा नादाँ इन्सान मैंने देखा नहीं .....

वक्त मुझे तुम सताओगे क्या ???????
सजा खुद को दिया मैंने तुम कर  पाओगे क्या??????


 वक्त से सीखा भूलना मुश्किल भरे दिन ....
जीना मैंने सीख लिया  साथी तेरे बिन

वक्त से दोस्ती बालू की भीत
अनजानी  सी राहें पगली सी प्रीत

वक्त के साथ मजबूत होती रही.....
निशा ढलती रही  शमा जलती रही .....

 

Thursday, July 19, 2012

विजेता

बेचैनी ,तनाव ,घबराहट
सृजन -पीड़ा की जान होती है
नया कुछ मिलनेवाला है
इसकी पहचान होती है
ख़ुशी-ख़ुशी जो इन्हें झेल लेता है
आनेवाले पल का वही विजेता कहलाता है .....

Monday, July 9, 2012

गम की गली

 

गम की गली

दर्द भरी

छोड़ चली .........

Thursday, July 5, 2012

क्षणिकाएं


           ( 1)

छोटी सी इक बात पे
रोती हुई आँखें
हँसने लगी ....
      
       (2)
बाबुल का अँगना
महकते रहना 
दुआ करती हूँ ....

    (3)
दिल की दहलीज
सूनी है
कब आओगे ?
   (4)
सुख़ गई
शादाब बेलें
बारिश की अधिकता से ...

   (5)

सुनाया जो दुःख अपना
साँझ ने निशा से
वो शबनम के आँसू
रोती रही .....



(शादाब -हरी -भरी )
.

Sunday, June 17, 2012

लहरें और चट्टान

ब्लागर साथियों आइए  आज  आपको मै अपनी नई कल्पना से मिलवाती हूँ ......मुर्गा पुराण से मुक्ति
दिलवाती हूँ .....बताइएगा  कैसी लगी मेरी नई कल्पना एवम रचना .......




नदी की लहरों और चट्टान में
बहुत अच्छी बनती थी .....
बात-बेबात बिना वजह ठनती थी
शायद ये लगाव का ही एक रूप था
लहरें खिलखिलाती थी ,
इतराती -इठलाती थी ...
मालूम नही था चट्टान को
ये उसकी आदत थी ....



अचानक चट्टान के मन में
आ गया अहंकार ....
अहम् ब्रह्म अस्मि के मद में आकर
करती रही  लहरों का तिरस्कार
अपनी धुन में मस्त लहरों को
ये बात समझ में नहीं आई
एक दिन ....जब वो चट्टान के पास आकर खिलखिलाई .
चट्टान ने उसको अपनी आँखें दिखलाई औ ...
निर्दई  भाव से चिल्लाई
राह की तेरे बाधाओं को दूर करती हूँ ....
तुझे क्या पता कि  खुश रहने के लिए मै तेरे
क्या -क्या सहन करती हूँ ???????
सुनकर उसकी बातें
लहरों का दिल टूट गया
जिसे सच्चा साथी समझती थी ?????
उसका साथ उसी पल से छूट गया .............


आज भी उसके जीवन में ....
सच्चे साथी की कमी है
सच्चे साथी की कमी से
उसकी आँखों में नमी है......




सच तो यही है कि ....
सच्चा साथी मिलना किस्मत की बात होती है
उसके अभाव में ही शायद ......
निशा शबनम के आंसू रोती है ...
कोयल  कुहूकती है
पपीहा पीऊ -पीऊ पुकारता है
मोर नाचते समय भी रोता है ........



ऐ ...मन ........दु:खी मत हो ...
ऐसा   बहुतों के साथ होता है .....





छोड़ दोस्ती चट्टान की
लहरें अभी भी खिलखिलाती है ...
चट्टान जहाँ खड़ी थी
वहीं खड़ी है ....
लहरें अनवरत आगे बढती जाती है ...
आगे बढती जाती है .....





Monday, April 9, 2012

मुर्गा बोला (6)

मुर्गा बोला ........
कुकड़ू  कूँ
हो गई गलती अनजाने में
कृपाकर माफ़ कर दो तुम ..........
वादा करता हूँ मै तुमसे
जिन बातों से दिल दुखता है तेरा
वो बात नही दुहराऊंगा
माँ ,बहन या भाभी हो मेरी ...
किसी के बहकावे में नही आऊंगा .......
जब से तूने घर छोड़ा है
तब से घर में दीपक नही हँसता
रसोई और पूजाघर की ज्योति भी
तेरे बिन जैसे सो रही है .....
बिना तुम्हारे ऐसा लगता ............
घर की डेहरी रो रही है .........



कौन है अपना ????/
कौन पराया ????/
सबकी नीयत जान गया  हूँ
अहमियत क्या है तेरी मेरे जीवन में .........
इसे अच्छी तरह पहचान गया हूँ ......
छोटी सी इक भूल से मेरी
दर दर भटक रहा है चूजा मेरा बेचारा .....
मुर्गी रानी मान भी जाओ
तुम बिन मेरा कौन सहारा ????????







मुर्गी बोली .....
जानती हूँ  .....
एक का धेर्य दुसरे का गुस्सा
दाम्पत्य जीवन को मजबूत बनता है .....
पर मौन जब मुखरित होता है तो ???????
काबू में कहाँ रह पाता है ???///
कब तक ?बोलो...... कबतक ?
तुम्हारे अत्याचार को मै सहती ?
नदी बिना किनारे की बन .....
कब तक यूं ही बहती ??????
बेशक .....माँ बाप के श्रवण कुमार बनो ....
बहना के बनो प्यारे भैया ....
भाभी के देवर ......
क्यों भूल जाते हो क़ि....
हो तुम मेरे भी जेवर ......



अर्धांगनी हूँ तुम्हारी
कैसे रह सकते मुझसे दूर ?????
मेरी मांग के सितारे ...
तुम हो मेरे सिन्दूर .......



दुःख देनेवाले करके काम
कैसे बनोगे तुम मेरे राम ?????

चूजों को साथ लिए मै
दर दर कैसे भटकती हूँ .......
कैसे कहूँ उन बातों को
जिनको कह फटती है मेरी छाती ....
यादें मेरे घर क़ी दिन रात है सताती ....


तुमसे और चूजों से ही तो ????????
महकता था घर संसार हमारा ...
मुर्गे राजा !मुझको चाहिए ..
केवल और केवल साथ तुम्हारा ......

Sunday, March 18, 2012

मुर्गा बोला (भाग -५)

मुर्गा बोला -कुकड़ू कूं
आ नहीं पाया होली में
नाराज तुम होती हो क्यूँ ?


जानता हूँ .........
फागुनी बयार ने ...
भौरों के गुंजार ने ...
पलाश के दहकते श्रृगार ने ....
वसंत दूत की मीठी कूक ने ...
मेरे वियोग में ,दिल में उठी हूक ने ....
तुम्हे  जी भरतडपाया होगा ..........


पिछली होली की यादों ने
मेरे द्वारा किये गये वादों ने
तेरा दिल बहुत दुखाया होगा पर ........?
याद रखो जीवन में चाही गई कई इच्छाएं .......
नहीं हो पाती हैं पूरी
जीवनसाथी हो मेरी
समझो मेरी मज़बूरी .



इंतजार करो मिलन के
स्वर्णिम क्षणों का जब ....
करूंगा हर कमी क़ी भरपाई
उत्साह औ उमंग के रंग से
रंगेगा खुशियों भरा संसार हमारा
मुर्गी रानी मान भी जाओ
तुम बिन मेरा कौन सहारा ?






मुर्गी बोली .........
नाराज नही हूँ मै......
मेरे दुःख  को समझो यार
एक दूजे के गम को हर ले
इसे कहते हैं प्यार .......



फूलों पर मंडरा रही है
तितलियाँ हौले -हौले
कोयल ,मोर .पपीहा बोले
भेद प्रणय के सभी हैं खोले
मदनोत्सव (होली ) के रंगीन माहौल में
चैन नही यहाँ ......
विरहाग्नि से दग्ध उर से
आवाज आ रही .......
मोरे पिया तूं कहाँ ?



तो क्या हुआ ?
तुम बिन गुजरी मेरी होली ....
यादें थी पिछली होली क़ी
थी नही मै अकेली ......

विश्वास औ प्यार भरा साथ हो गर ...?
जीवनसाथी का तो ????????/
हर दिन होली और हर रात दिवाली होती है
तन- मन प्यार के रंग रंगे
यही  तो जीवन क़ी ज्योति है .....

जीवनसाथी का साथ है ऐसे जैसे
नदी औ किनारा
मुर्गे राजा ! मुझको चाहिए
केवल औ केवल साथ तुम्हारा .......




मुर्गे -मुर्गी के संवाद ने अगर आपको थोड़ी सी भी खुशियाँ दी हो तो
कृपया अपने विचार अवश्य लिखें .भले मेरे साथ न्याय न करें पर अपने
साथ अन्याय क्यों ???????///धन्यवाद गुप्त दोस्त ..