Tuesday, May 13, 2014
Friday, April 18, 2014
उन्हें मालूम नहीं
एक बार फिर किसी ने भरते जख्मों को झिंझोड़ा है
चुनौतियों का समन्दर है
सम्बल बहुत थोड़ा है.…पर…
उन्हें मालूम नहीं
लोहे से बनीं नहीं मैं..... जो.…
टूट कर बिखर जाऊँगी
मोम सी प्रकृति है मेरी,,, मैं.…
पिघलकर फिर जम जाऊँगी
माँ-बहन-बेटी -पत्नी या प्रेमिका हीं नहीं मैं.....
सृष्टि का आधार हूँ
आहों के बीच पली मैं
खुशियों की किलकारी हूँ
चुनौती देनेवाले हर शख्स की आभारी हूँ
जीवन को जीवन देनेवाली मैं
एक संवेदनशील नारी हूँ.……
Friday, March 28, 2014
ओ पलाश
चम-चम -चम चमकते हो
अग्नि जैसे दहकते हो
उमंग-उल्लास या फिर
जो है उसमें संतुष्ट रहने की चाह
नहीं किसी से कोई आस
क्या वजह है तेरी खुशियों की ?
बता दे मुझको ओ पलाश -----
मौसम-मस्ती और तन्हाई
लिए साथ में खुशियाँ आईं
सौंन्दर्यविहीन वसुंधरा पे
भाव -विभोर हो जाते हो -----
पथभ्रष्ट मुसाफिर को
ये मूलमंत्र बतला देना
जो दिया है उसको प्रकृति ने
उसमें जीना उसे सिखा देना
मेरे,उसके,सबके मन में------
ओ पलाश तुम छा जाना--
ओ पलाश तुम छा जाना----
अग्नि जैसे दहकते हो
उमंग-उल्लास या फिर जो है उसमें संतुष्ट रहने की चाह
नहीं किसी से कोई आस
क्या वजह है तेरी खुशियों की ?
बता दे मुझको ओ पलाश -----
मौसम-मस्ती और तन्हाई
लिए साथ में खुशियाँ आईं
सौंन्दर्यविहीन वसुंधरा पे
भाव -विभोर हो जाते हो -----
पथभ्रष्ट मुसाफिर को
ये मूलमंत्र बतला देना
जो दिया है उसको प्रकृति ने
उसमें जीना उसे सिखा देना
मेरे,उसके,सबके मन में------
ओ पलाश तुम छा जाना--
ओ पलाश तुम छा जाना----
Thursday, March 13, 2014
ले लो एक विराम

हौले-हौले झूम के कलियाँ
नववधू सी शरमा रही है …
लिए आँखों में इंद्रधनुषी सपने
अग्रदूत वसंत का --भौंरा
गीत मिलन के गा रहा है ---
आम्रकुंज से कोयलिया ने
पी को है पुकारा ----
कहाँ गया मनमौजी मेरा
किस सौतन ने घेरा ?
टेसू की डाली पर छाई
वासन्तिक बहार
लिए दामन में सपन-सलोने
आया रंगों का त्यौहार ---
बचपन ,यौवन और बुढ़ापा
जीवन के हैं रंग
काम -काम में हो न जाए
जीवन ये बेरंग ---
ले लो एक विराम
कर लो हँसी -ठिठोली
उमंगों के इस उत्सव को
भूल न जाना हमजोली ----
प्रकृति की इस पुकार को
न करना नजरअंदाज
मुरली की मधुर तान पर --राधारानी ---
झूम रही है आज ---
मन बावला फगुआ गाये
मस्ती छाई रे
प्रीत की पक्की रंग लिए फिर
होली आई रे …।
आप सभी को होली की अग्रिम शुभकामनाएं---
Tuesday, March 4, 2014
बड़े अच्छे लगते हो---
न जाने क्यों तरसते हो
रह-रह कर मचलते हो
कभी कटु कभी मृदु
कौतूहल से भरपूर सत्य ---तुम---
बड़े अच्छे लगते हो---
दुनियाँ आनी -जानी है
हर शख्स की अजब कहानी है
पल-पल बदलते मौसम में
अटल -अविचल रहते हो
जिसे चाहिए जैसा हिस्सा
वैसा उसे दे देते हो
सत्य तुम बड़े सच्चे हो -----
विचित्रताओं के हमराज़
खुशियों के सरताज़ सत्य ---तुम ---
बड़े अच्छे लगते हो ----
जीवन के हरेक पड़ाव में
तेरे साये के शीतल छाँह में
मैंने जीना सीख लिया है
क्या बताऊँ ! तेरे संग कैसे
खुद को मैंने जीत लिया है
आगे के जीवन में भी
संग हमेशा रहना
बनकर निर्झर निर्मल जल का
बूँद -बूँद बरसना
हंसी-ठिठोली करते तुम
प्यारे से बच्चे लगते हो
सपनों के सृजक सत्य --तुम--
बड़े अच्छे लगते हो --
ब्लॉगर साथियों नेट की आँख -मिचौनी की वजह से १ मार्च के लिय़े लिखी गई रचना को आज पोस्ट कर रही हूँ। सत्य और उसकी सच्चाई के साथ मेरे जीवन के अनुभवों का निचोड़ है इसमें -----
Thursday, January 30, 2014
गाती जाए सोन चिरैया-----
घर छोटा और गाड़ी छोटी पर ---दिल बड़ा रखना भैया
मेरे छत के मुंडेरे पे
गाती जाए सोन चिरैया-----
कुर्ते गंदे और जूते गंदे पर ---
नीयत साफ रखना भैया
मेरे छत के मुंडेरे पे
गाती जाए सोन चिरैया ---
संदूक खाली और हाथ खाली पर ---
आँखें भरी(सपनों से) रखना भैया
मेरे छत के मुंडेरे पे
गाती जाए सोन चिरैया ---
मन पर बंधन तन पर बंधन पर ---
दिमाग स्वतंत्र रखना भैया
मेरे छत के मुंडेरे पे
गाती जाए सोन चिरैया ---
Tuesday, January 7, 2014
मेरी माँ
सात जनवरी २ ० ० १ को काल के क्रूरतम चक्र ने
मेरी माँ को मुझ से जुदा कर दिया था पर मुझे कई बार महसूस हुआ है कि अगर हम किसी को बेइन्तहा प्यार करते हैं तो दुनिया की कोई ताकत हमें उनसे जुदा नहीं कर सकती ---मैं जब भी कभी बहुत गहरे सदमें या दुःख में घिरी रहती हूँ तो मेरी माँ सपने में आकर मुझे refresh कर देती हैं. आज माँ की पुण्यतिथि है उन्हें गए तेरह साल हो गए पर ऐसा लगता है वो मुझसे दूर नहीं है यहीं आसपास हैं कहीं। वो मुझे दिखती हैं खेतों की हरियाली में-- गेहूँ की बाली में। मटर की फली मुझे बचपन में अच्छी नहीं लगती थी पर माँ इतने प्यार से तोड़ कर खिलाती थीं कि मै
मना नहीं कर सकती थी। मटर ,चने और सरसों की भाजी मुझे तब भी अच्छी लगती थी और आज भी अच्छी लगती है पर मटर की फली आज सबसे ऊपर है प्राथमिकता कि सूची में। खरीदी हुई नहीं --खेत में लगी हुई। जब भी मौका मिलता है---मैं फसल से भरे खेतों में अवश्य जाती हूँ। अजीब सा सुकून मिलता है मुझे वहाँ।
माँ को समर्पित है मेरे दिल के कुछ उदगार ------
हरियाली उनकी आन थी
हरियाली उनकी शान थी
बहुत बड़ी हस्ती,,,,,,? तो नहीं थी पर,,,,,मेरी माँ ,,,,
एक सरल-सहृदया किसान थीं।
जिसकी ममता का भंडार कभी
खाली नहीं होता था,,,
उस ममत्व की कमी से --कभी-कभी लगता है ----
---- ये दुनिया वीरान ----
----- तेरे बिन -----
सूना हो गया मेरा मायका --मेरी माँ ---
तेरी जैसी माँ हर किसी के नसीब नहीं है
मेरे जैसी हर बिटिया खुशनसीब नहीं है
तेरे संग बिताये हर लम्हे को
अपनी बिटिया के संग जीती हूँ
बेटी नहीं अब माँ बन कर
दुःख-दर्दों को पीती हूँ ---
कभी-कभी खुद से कई सवाल करती --
तेरी मुनिया ---कैसी अजीबोगरीब है ये दुनिया ?
जिसके लिए पुल बनाओ वो खाई खोद देता है
जिसे सम्मान दो वो अपमान के गर्त में धकेल देता है
जिसका फायदा करवाओ वो नुकसान करवाता है-- वहीँ --
दूसरी ओर एक अजनवी बिना लाभ-हानि की परवाह किये
इतना मान-सम्मान दे जाता है कि आँखें भर आती हैं और
दिल गदगद हो जाता है ---
तेरी दी हुई हर शिक्षा मुझे मार्ग दिखलाता है.
हर पल जो ख़ुशी से जियें उसे कहते हैं--जी-वन-
इतना अच्छा जीवन देने के लिए माँ--तुम्हेँ--- बारम्बार नमन.....
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