Sunday, May 10, 2015

पता नहीं क्यों ----माँ -----

सच कहूँ माँ..... 
मुझे तुम्हारी नहीं 
तुम्हारी उन बातों कि  याद आती है 
जब मुझे रुलानेवाले से तुम 
हमेशा कुपित हो जाती थीं  
बड़े प्यार से --मान --मनुहार से 
मनपसंद खाना  खिलाती थी 
जब किसी वजह से मैं 
खुद से हीं रूठ जाती थी 
मेरे सपने , मेरी खुशियाँ थे 
तेरे जीवन के आधार 
मनोयोग से करती थीं 
उन सपनों को साकार 
                                  तेरे बिन ------
                                                जीवन के इस धूप -छाँह में 
                                               संघर्षों के सबल बाँह में 
                                            जब अनायास मुस्कुराती हूँ 
                                                                          उसी समय 
पता नहीं क्यों ----माँ -----
तुम बहुत --बहुत ---बहुत --बहुत याद आती हो।  
                                              सभी माँओं को समर्पित है मेरे दिल के ये उदगार । माँ अपनी बेटियों को सिर्फ आत्म विश्वास रूपी पंख दे --जीवन का जंग वो खुद ही जीत लेगी। 

Wednesday, April 1, 2015

अटूट सम्बन्ध है

अश्क और आहों का 
प्यार और बाँहों का 
मंज़िल और राहों का 

प्यास और तड़प का 
जीवन और संघर्ष का  
वचन और अनुबंध का 

शाम और सवेरा का 
प्रकाश और अँधेरा का 
साथ और सहारा का 

दोस्ती और साझेदारी का 
विश्वास और  जवाबदारी का
दिल और लाचारी का  

अटूट सम्बन्ध है। 

     इसे सिर्फ पढ़िए नहीं, महसूस करके  देखिये। पता चल जायेगा। 

Wednesday, March 25, 2015

हर पल

विषाद है तो हर्ष है 
जीवन एक संघर्ष है 
संघर्षों से नहीं डरना है 
हर पल आगे बढ़ना है। 

Sunday, March 8, 2015

तम से घिरे अमावस में अब

रुख हवाओं ने मोड़ लिया 
मौसम भी है बदल गया 
योग्यतम की अतिजीविता 
का शिकार माँ का लाल हो गया 
स्वाइन फ्लू कहर बनकर 
जिन  की खुशियों पर छा गया 
क्या होली क्या दिवाली 
क्या मायने हैं शेष जीवन के 
उनको ढांढस कौन बँधायेगा ?
तम से घिरे अमावस में अब 
चाँद कहाँ से आएगा ?
                            मन्दसौर के २३ वर्षीय युवा इंजीनियर आशुतोष के असमय निधन पर अश्रुभरी  श्रद्धांजलि ---भगवान उसकी आत्मा को शांति दे और उसके परिवार वालों को दुःख सहने की शक्ति । 

Thursday, February 19, 2015

विषपान





अहिल्या-सहगामिनी होने के नाते
पति की इच्छा का सम्मान करना
तुम्हारा धर्म था
पर उनमें आये
अनायास परिवर्तन को
पहचानना भी तो
तुम्हारा कर्म था
कठपुतली न बन
अपने विवेक का
किया होता उपयोग
अपने आसपास
घटी घटनाओं का
रखा होता ध्यान
तो असली-नकली
सही-गलत की
शीघ्र हो जाती पहचान
गौतम ऋषि की कुटिया
न पडी होती यूँ सुनसान औ विरान
 न हीं पत्थर की प्रतिमा बन
पल-पल करना पडता
व्यथा और ग्लानी का
पति से वियोग का
असहनीय अपमान का
सदियों तक विषपान। 
मेरी बहुत पुरानी रचना । मन में आये भावों को लिख लेती हूँ। मुझे ऐसा लगता है कुछ पौराणिक बातें प्रतीक है जो हमारी सभ्यता एवं संस्कृति को निखारने का काम करती है.सभी मेरे विचारों से सहमत हो आवश्यक नहीं।इस रचना के माध्यम से मैं  ये कहना चाहती हूँ   की अगर शरीर में आये परिवर्तन को महसूस करें तो  बीमारी का उचित समय में इलाज़ कराया जा सकता है और पति -पत्नी एक दूसरे के स्वभाव में आये परिवर्तन को महसूस करे तो परिवार को बिखरने से रोका  जा सकता है। । किसी  की  कमियों को रेखांकित करना मेरा उद्देश्य नहीं है। कृपया रचना  के मूलभाव को समझने का प्रयास करें।  धन्यवाद। 

Wednesday, December 31, 2014

राहें थीं जानी-पहचानी

राहें थीं जानी-पहचानी 
राहगीर थे मगर अनजान 
निशा की ओट से देखो कैसे 
झाँक रहा बिहान ----

कृत्रिमता से दूर रहकर 
स्नेह सदा सहेजना 
जलना धूप -अगरबत्ती बन 
मेरी बातों का मर्म समझना ----

वर्तमान अतीत बन कर 
कागज के पन्नों में समा गया 
भविष्य भावों में ढलकर 
वर्तमान पे छा गया --

तेरी खुशियाँ -तेरे सपने 
सारे हो साकार 
विदा लेते कह रहा २०१४ 
२०१५ ले रहा आकार … 
                                    सभी  ब्लॉगर साथियों को नए वर्ष की बहुत -बहुत शुभकामनाएं --- 
भगवान करे इस नए साल में आपको, आपके स्तर के दोस्त मिले --दुश्मन भी मिले ताकि आपका जीवन काँटों में घिरकर फूलों जैसे खिले। ....... इसके लिए बस आपको  इतना करना होगा कि आप मर्यादित रहें --संयमित रहें साथ हीं साथ .……  अपने और अपने परिवार के प्रति ईमानदार रहें ----अगर मेरे शुभचिंतक हैं तो -----
मुझे भी कुछ सुझाव अवश्य दें---टिप्पणी के रूप में ----- 
समर्पित --पी -एच -डी -कोर्से वर्क की पुरी टीम को। 




Friday, October 10, 2014

मैं मस्ती के संग बहती हूँ

भागती हुई नदी से पूछा मैंने --

क्यों  अपना अस्तित्व मिटाती हो ?
जब देखो सागर से मिलने वेवजह चली जाती हो 
आँखों में गहरा राज़ लिए नदी मुस्कुराई 
प्रकृति की विचित्रताएं भला आज तक किसी को समझ में आई ?
सागर से मिलकर मैं अपना भार हल्का कर  आती हूँ 
बनी रहूँ नदी हमेशा इसीलिए चली जाती हूँ 
जाकर सागर मैं अपना अस्तित्व सुरक्षित कर आती हूँ 
भागकर मिलती उससे पर उड़कर चली आती हूँ 
ताल-तलैया -दरिया सभी को प्यार का राग सिखाती हूँ 
भूले -भटके राहगीरों के प्यास की आग बुझाती हूँ 
अनजाने -पथ पर चल कर मैं गीत मिलन के गाती हूँ 
हूँ अकेली कहने को पर-- साथ सभी के रहती हूँ 
कल-कल निनाद करते-करते मैं ----
मस्ती के संग  बहती हूँ --मैं मस्ती के संग  बहती हूँ।