Wednesday, July 24, 2013

यादों के फूल

जहाँ अपनापन रहता था कभी … 
वहाँ सूनापन बसने लगा है                                                       
वसंत के डाल पे हो सवार … 
पतझड़ कमर कसने लगा है …. 

सूना आँगन सूनी गली …. 
सूना हो गया मन … 
प्रियजन के बिछोह से  …
तरसे दोनों नयन … 

एक वक्त वो  था जब … 
 काँटे भी नहीं चुभते थे 
एक वक्त ऐसा भी आया 
जब फूलों ने लहुलहान किया …. 

घर (मायका)  के  कोने -कोने से 
बही प्रेम की पुरवाई …. 
बिछड़ गए जो जीवन-पथ पर 
उनपर यादों के फूल चढ़ा आई …


Tuesday, July 2, 2013

प्रशासक सभी बहरे हैं .....

पिछले साल १ ० --१ २  जून को लौटी थी केदारनाथ से ....
केदारनाथ कभी जा हीं नहीं सकती मैं ......मैं हमेशा यही सोचा करती थी 
पर अचानक पता नहीं कैसे चली गई ....किसी का साथ मिल गया या भगवान् की मर्जी कुछ कह नहीं सकती पर ..वहाँ की अव्यवस्था और खतरनाक रास्ते को देख मैंने खुद को अनेकों बार कोसा  था  कि मै  क्यों आ गई यहाँ ....और अभी जो कुछ भी वहाँ हुआ और हो रहा है ... ...उसे देख दिल बड़ा व्यथित हो रहा है ...अपने दिल के कुछ ऐसे हीं भावों को प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूँ ......


सिसक रही चट्टान 
आसमां है रो रहा 
निस्तब्ध है निशा 
ये कौन जा रहा बहा ?

किसी की आँखों का तारा 
किसी के जीने का सहारा 
काल-कवलित हो गया 
देखते हीं देखते 
प्रलय कहाँ से आ गया ?

नदी जो कल-कल गाती थी 
सड़कें भी इठलाती थी 
वो आज वीरानों में 
खुद से नज़र चुराती है 
कैसे भूल जाए कोई ?
यादें याद आती है ...

प्रकृति से खिलवाड़ का 
होता भयानक परिणाम 
नाम जिसका गुँजता  था 
वो हो गए बेनाम .....  

कर कल्पना उनकी 
रूह काँप जाती है 
बिछुड़ गए जो अपनों से 
उनके लिए आँखें भर-भर आती हैं .....

सत्ता ,पैसा ,जिस्मफरोशी 
में हो जाते हैं मदहोश 
अव्यवस्था का पर्याय बन गया 
प्य्रारा भारत देश ....
मरने वाले दोषी नहीं थे 
सारे थे निर्दोष 

हर गली में रावण घूमता 
धर कर राम का वेश 
कौन बने हनुमान  ?
जो पहुचाये सीता तक सन्देश ....

दुर्योधन और शूर्पनखा की जाति न कोई होती 
इतिहास पुनः दुहराया जाएगा 
सोच प्रकृति पल-पल रोती ....

कौन समझे ये बात 
सभी पे .....लालच रुपी पहरे हैं ..
सुरा -सुन्दरी में लिप्त ....
प्रशासक सभी बहरे हैं .....

आस्था ,निष्ठा और भक्ति को 
यूँ व्यर्थ न भुनाओ 
धार्मिक स्थल को धार्मिक हीं रहने दो 
उसे पर्यटन स्थल न बनाओ .....




Wednesday, June 19, 2013

बन जाते हैं वही मन -मीत ...

खुशियाँ तुम को मिले हमेशा 
मेरी हार हो तेरी जीत 
पल-पल तुम्हें   दुआएँ देता 
ऐसे हैं अलबेले गीत .....

मन हँसता पर दिल रोता है 
पीर बन जाती है गीत 
जिसे परख नहीं हमारी 
बन गए वही हमारे मीत .....

जीवन की ये रीत पुरानी 
कुहूके कोयल ...  नाचे मोर 
मीत बिना सब सूना होता 
चाँद को ढूंढे व्याकुल चकोर ....

विरह-व्यथा शब्दों में ढलकर ..
बन जाते है विरही गीत
 जिसे खबर नहीं हो पाती 
बन जाते हैं वही मन -मीत ...

Tuesday, June 4, 2013

.लम्हा-लम्हा जिन्दगी का

बिखरे सपने
बिछुड़े  अपने
दिल दर्द में 
डूबता है .....
.लम्हा-लम्हा जिन्दगी का 
आगे बढ़ता है .....


चले गए जो ..
नहीं ...मिलेंगे 
दिल रह-रह कहता है ...
यादों में उनके 
व्याकुल होकर 
मन मचलता है .....

सतरंगी सपनों को राही 
फिर भी  गढ़ता है ...

अपने हैं तो सपने हैं 
सपने हैं तो जीवन 
आना -जाना 
लगा रहेगा ....समझो ..मेरे मन .......


Saturday, June 1, 2013

दीदारे-यार

दिल से दिल मिले तो ....
प्यार होता है 
दिलो - दिमाग मिले तो .....
दीदारे-यार होता है 

Friday, May 24, 2013

दिल बंजारा

फूलों का  खुशबू से 
 बादल का बूँदों से
रवि का किरणों से 
झरनों का  जल से .....
जनम -जनम का नाता है ....
तनहाई के आलम में 
दिल बंजारा गाता है ....

Sunday, May 12, 2013

.वो केवल और केवल ....माँ थी ....

जब भी मैं घबराती 
भीड़ से कतराती 
एक अनोखी ढाल लिए वो ...
सामने मेरे आती ....                          


कहतीं वो मुझसे 
हाथी चले बाजार तो…… 
कुत्ते भौकें हजार 
इन कुत्तों से घबराना क्यों ?
दिल को अपने सहमाना  क्यों ?

जब भी मैं कभी  उन्हें उदास दिखी 
मुस्कुराते हुए कहा उन्होंने ...
निशा ..तुम्हारी किस्मत ..भगवान् ने ..(शायद हर माँ ऐसा विश्वास दिलाती                                                                                                                                                                                           
                                                          है  अपने बच्चे को )
                                                              
सोने के कलम से लिखी .....

इसीलिए कभी जिन्दगी में 
उदास नहीं होना 
परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हो 
हरदम हँसती  रहना .....

याद रखना ..
पानी की अधिकता और कमी से 
पौधे रहते हैं कुम्भलाये 
जो मिल-जुलकर खाए 
वही राजा  घर जाए ......

राजा  और रानी की कहानी उसने 
कई बार सुनाई थी ....
बिना कहे कई बातें अनजाने में ..हीं ...
सिखाई थी .....

माँ बनकर जान गई 
कितना कठिन होता है 
माँ की भूमिका निभाना 
आसान नहीं होता 
बच्चों को अच्छी बातें सिखलाना ...

आज वो नहीं होकर..... भी है .....
मेरी हँसी की खनक में 
मेरे चेहरे की चमक में ......

वो कल भी थी ..
वो आज भी है ....
वो कल भी रहेगी ..
                  क्योंकि ... वो
 न औरत थी
न पत्नी थी  
 न बहन थी 
न बेटी थी ....वो केवल और केवल ....माँ थी .....