Friday, October 18, 2013
Sunday, September 29, 2013
कहा चाँद ने रजनी से ,,,,,,
कहा चाँद ने रजनी से
तुम्हारी खातिर मैं .…
चाँदनी तो क्या,…
आसमान भी छोड़ दूँगा
चैन मिले तुम्हें हमेशा इसलिए
मैं अकेला ही जी लूँगा
हर गम हँसते-हँसते पी लूँगा
मैं अकेला ही जी लूँगा
हर गम हँसते-हँसते पी लूँगा
प्यार किया है तो निभाना आता है,….
तुम्हारे लिए मिट जाना आता है,…
सुनो मेरी प्राण-प्रिया
तेरे बिन धड़कता नहीं मोरा जीया,…….
तुम मेरी जान हो ,…इसलिए विरह में तेरे
अपनी जान नहीं दूंगा
इस बात से अनजान हो
करूँगा नहीं कभी शिकवा ,…
खुद से खुद को छिपा कर
दुनियाँ को बता दूँगा ,…….
प्यार होता है क्या
बिना बोले जता दूँगा ,…….
Monday, September 23, 2013
Wednesday, September 4, 2013
चाणक्य बनकर चन्द्रगुप्त को पहचानिए
एक समय ऐसा था जब हमारे दिलों में
माँ-बाप ,भाई-बहन ,सगे संबंधियों के साथ
लंगोटिया यार रहते थे----
एक समय ऐसा भी आया
जब हमारे दिलों में किरायेदार रहने लगे
जो समय-समय पर मनवांछित किराया चुकाते हैं
मौका मिलने पर नए बसेरे की खोज कर
फुर्र से उड़ जाते हैं(संबंधों का विकृत रूप )
भले हीं उनकी याद में हमारा दिल
फूट-फूट के रोता है पर
उन किरायेदार पर उसका असर
भला कहाँ हो पता है ?
वो तो नए सपने ,नई महत्वाकांक्षा के साथ
एक बार फिर से नया बसेरा बसाता है
और जिन्दगी भर बसेरा बसाने की
कोशिश में हीं लगा रह जाता है
ऐसे लोगों का बसेरा क्या ? कभी बस पाता है ? (दिग्भर्मित रहते हैं जिन्दगी भर )
ऐसे में क्या करें ? किसे दोष दें ?
मकान को घर बनानेवाली माँ का - ?(माँ प्रथम शिक्षक कहलाती है )
परीक्षा लेनेवाले परीक्षक का - ? ( प्रणाली में उपस्थित सारे लोग एवम परिस्थितियाँ )
या फिर देश के भावी कर्णधार को तैयार करनेवाले शिक्षक का - ?
(शिक्षक विद्यार्थियों की दूसरी माँ कहलाते हैं और बच्चे दूसरी माँओं का कहना ज्यादा मानते हैं )
जो भावी कर्णधार को संवेदनशील इंसान बनाने के बजाय ----
राक्षसी प्रवृति वाले लोभी इंसान बना देते हैं और-----
समय आने पर --
अपनी आवशयकताओं की पूर्ति के लिए उनके आगे गिडगिडाते हैं
सोचिये -------
राष्ट्र का निर्माण करनेवाली माएँ
अपनी आवशयकता की पूर्ति के लिए गिडगिडाएगी ---तो ?
राष्ट्र की आत्मा भला चैन से कैसे रह पाएगी
इसीलिए … हे माएँ ( हे शिक्षक ) ----
अभी भी समय है
चाणक्य बनकर चन्द्रगुप्त को पहचानिए
शिक्षक का चोला उतारकर
एक बार फिर से गुरु जी बन जाइये
अपने विद्यार्थियों को डॉक्टर ,इंजीनियर , नेता और शिक्षक
बनाने के स्थान पर ( पद के मद में चूर हो जाते हैं लोग )
संवेदनाओं से भरपूर इंसान बनाइये
तभी राष्ट्र की माँ -बहन और बेटी भी
सुरक्षित हो अपनी भूमिका निभाएगी और --
राष्ट्र की आत्मा भी चैन से रह पायेगी
आप सभी को शिक्षक दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं
Sunday, August 25, 2013
Friday, August 23, 2013
सुमित संग रूपम
रणविजय कुमार
निशा मौसी का हाथ -प्यारा सा साथ
एक डाली के कई फूल-नानी का गाँव परियों का जहाँ …अभिनव,मनीषा मौसी ,सुनील मामा ,नानी, भावना , स्वर्गीय विमल किशोरी -बड़ी मौसी,अभिषेक आशीष।
कितना प्यारा अतीत हमारा -नानाजी ,मम्मी और मौसी,मौसाजी का साथ -बड़ा था न्यारा
रिश्तों का रूप बड़ा अनोखा-मम्मी की गोद से मैंने देखा-राहुल रौशन
दिल में मची खलबली
छोड़ हमारा प्यारा सा,सुन्दर सा ,छोटा सा प्राकृतिक घोंसला
प्यारी मौसी पी -संग चली
प्यारा सा वो आँगन जहाँ अपनापन रहता था-नानाजी ,नानीजी ,पापा ,मम्मी,मौसी एवम भाई-बहनों का साथ - स्वर्ग सा बसेरा
रखिया बंधा ले भैया सावन आला -संकेत की पहली राखी
मान लेना मम्मी का कहना -प्यारी बहना मिलती रहना -रूपम प्रिया और स्वाति प्रिया
सुखमय पल --ख़ुशी ,स्वाति,मनीषा ,राहुल, रुपम,ईशा और बड़े दामाद गौतम जी -रूपम ससुराल चली अब
ईशा की करनी है तैयारी। चिंता मत करो राहुल आएगी तेरी भी अभी बारी----

लाडों में पली ,नाज़ों से पली ,प्यारी बिटिया ससुराल चली
दो पथिक मिले ,एक राह चले ,दो सपनों ने ली अंगड़ाई -सुमित संग रूपम
लिए नयनों में सुनहरे सपने -पहुंची पी के घर अपने
समय-समय पर भेजना बहना अपना सन्देश
यही कामना कर रहा है राहुल संग पुष्पेश

खुश रहना तुम घर में अपने स्वर्ग उसे बनाना
हम सबकी तहेदिल से यही है मनोकामना
एक डाली के हैं हम फूल
संबंधों की जमीं पर खुशियों का जहाँ हो -जेठ और जेठानी
चाँद -तारों से भरा एक प्यारा सा आसमान हो
अमित आनंद से भरा रहे जीवन
न हो कोई कमी

भाव -विह्वल हो दिल बरसा
आँखों में है नमी -- -सासू माँ और ससुर जी
माँ तो नहीं बन सकती पर-----
माँ -सी (मौसी) हूँ तेरी
खुशियाँ सहचरी बने
दुआ है मेरी
जैसे अँगूठी में धातु और नगीने की
जोड़ी होती अनुपम
वैसे हीं जुडी रहे सुमित संग रूपम
बँधे रहे अटूट बंधन में
कम न हो कशिश
अमर रहे सुहाग तुम्हारा
देती यही शुभाशीष
Wednesday, July 24, 2013
यादों के फूल
जहाँ अपनापन रहता था कभी …
वहाँ सूनापन बसने लगा है
वसंत के डाल पे हो सवार …
पतझड़ कमर कसने लगा है ….
सूना आँगन सूनी गली ….
सूना हो गया मन …
प्रियजन के बिछोह से …
तरसे दोनों नयन …
एक वक्त वो था जब …
काँटे भी नहीं चुभते थे
एक वक्त ऐसा भी आया
जब फूलों ने लहुलहान किया ….
घर (मायका) के कोने -कोने से
बही प्रेम की पुरवाई ….
बिछड़ गए जो जीवन-पथ पर
उनपर यादों के फूल चढ़ा आई …
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