Friday, August 15, 2014

यादें तेरी गलियाँ

यादें तेरी गलियाँ
जब,जबरन मानस पे  छाती है
उखड़ा-उखड़ा दिल रहता है
आँखें छलक जाती है,,,,,,,

अपनों का नेह
वो निश्छल स्नेह
वो ममता की छाया
किसने चुराया ?


छोटी-छोटी बातें हैं
रहस्य है गम्भीर
हँसकर जिसने इनको झेला
उसे कहते हैं वीर,,,,,,,



विचित्रताओं की दुनिया  है
अपनों में  अपना है कौन ?
हर  पल दिल उन्हें ढूँढता
प्रकृति भी है मौन,,,,,,






Tuesday, July 1, 2014

उनको मेरा सलाम

बहुत दिनों के बाद थोड़ी सी राहत मिली है.सोचा इस पल को यादगार बना लूँ  …२९ दिसम्बर २०१३ की रात  में देखे गए सपने की झलक को  २९ जून २०१४ में वास्तविक रूप में घटते  देखा,,,, कोई माने या न माने ,,,,पर मैं मान गई.… मेरे उसी सपने को समर्पित है मेरे दिल के ये उदगार ------

अपने-अपने स्वार्थ की खातिर 
सही राह से भटका देते हैं 
सपना ---सपने में आकर 
मुझे राह दिखलाते हैं ----

नहीं चाहिए ऐसे अपने 
नहीं चाहिए कोई नाम 
मेरे अपने सपने हैं 
उनको मेरा सलाम ------
    


Tuesday, May 13, 2014

बनाना चाहो तो

बनाना चाहो तो 
बिगड़ जाता है 
चाँद चाँदनी की 
 हर कोशिश पे 
खिलखिलाता है 
क्या हुआ  जो
रास्ते पे चट्टान 
आ गिरी 
चट्टान से बचकर 
निकलना मुझे आता है 
बिना कुछ कहे चाँदनी 
खिलखिलाती है 
हो परिपूर्ण बुलंद हौसले से 
चाँद से नज़रें मिलाती है 
उबड़-खाबड़ रास्तों पे 
रहती सबसे हिल-मिल 
लहरों के रथ पे हो सवार 
करती रहती झिलमिल 





Friday, April 18, 2014

उन्हें मालूम नहीं

एक बार फिर किसी ने 
भरते जख्मों को झिंझोड़ा है 
चुनौतियों का समन्दर है 
सम्बल बहुत थोड़ा है.…पर… 

                          उन्हें मालूम नहीं 
लोहे से बनीं नहीं मैं..... जो.…
टूट कर बिखर जाऊँगी 
मोम सी प्रकृति है मेरी,,, मैं.…
पिघलकर फिर जम जाऊँगी

माँ-बहन-बेटी -पत्नी या प्रेमिका हीं नहीं मैं..... 
सृष्टि का  आधार हूँ 
आहों के बीच पली मैं 
खुशियों की किलकारी हूँ 
चुनौती देनेवाले हर शख्स की आभारी हूँ 
जीवन को जीवन देनेवाली मैं 
एक संवेदनशील नारी हूँ.…… 


Friday, March 28, 2014

ओ पलाश

चम-चम -चम चमकते हो 
अग्नि जैसे दहकते हो 
उमंग-उल्लास या फिर 
जो है उसमें संतुष्ट रहने की  चाह 
नहीं किसी से कोई आस 
क्या वजह है तेरी खुशियों की ?
                              बता दे मुझको ओ पलाश -----
मौसम-मस्ती और तन्हाई 
लिए साथ में खुशियाँ आईं 
सौंन्दर्यविहीन वसुंधरा पे 
भाव -विभोर हो जाते हो -----

पथभ्रष्ट  मुसाफिर को 
ये मूलमंत्र बतला देना 
जो दिया है उसको प्रकृति ने 
उसमें जीना उसे सिखा देना 
मेरे,उसके,सबके मन में------
                       ओ पलाश तुम छा जाना--
                        ओ पलाश तुम छा जाना----

Thursday, March 13, 2014

ले लो एक विराम


हौले-हौले झूम के कलियाँ  
नववधू सी शरमा  रही है … 
लिए आँखों में इंद्रधनुषी सपने 
अग्रदूत वसंत का --भौंरा 
गीत मिलन के गा रहा है ---

आम्रकुंज से कोयलिया ने 

पी को है पुकारा ----
कहाँ गया मनमौजी मेरा 
किस सौतन ने घेरा ?

टेसू की  डाली पर छाई 

वासन्तिक बहार 
लिए दामन में सपन-सलोने 
आया रंगों का त्यौहार ---

बचपन ,यौवन और बुढ़ापा 

जीवन के हैं रंग 
काम -काम में हो न जाए 
जीवन ये बेरंग ---

ले लो एक विराम 

कर लो हँसी -ठिठोली 
उमंगों के इस उत्सव को 
भूल न जाना हमजोली ----

प्रकृति  की  इस पुकार को 

न करना नजरअंदाज 
मुरली की  मधुर तान पर --राधारानी ---
झूम रही है आज ---

मन बावला फगुआ गाये 

मस्ती छाई रे 
प्रीत की   पक्की रंग लिए फिर 
होली आई रे …। 
                        आप सभी  को होली की  अग्रिम शुभकामनाएं---


Tuesday, March 4, 2014

बड़े अच्छे लगते हो---

न जाने क्यों तरसते हो 
रह-रह कर मचलते हो 
कभी कटु कभी मृदु 
कौतूहल से भरपूर सत्य ---तुम---
बड़े अच्छे लगते हो---

दुनियाँ आनी -जानी है 
हर शख्स की  अजब कहानी है 
पल-पल बदलते मौसम में 
अटल -अविचल रहते हो 
जिसे  चाहिए जैसा हिस्सा 
वैसा उसे दे देते हो 
सत्य तुम बड़े सच्चे हो -----

विचित्रताओं के हमराज़ 
खुशियों के सरताज़ सत्य ---तुम ---
बड़े अच्छे लगते हो ----

जीवन के हरेक  पड़ाव में 
तेरे साये के शीतल छाँह में 
मैंने जीना सीख लिया है 
क्या बताऊँ ! तेरे संग कैसे 
खुद को मैंने जीत लिया है 
 आगे के जीवन में भी 
संग हमेशा रहना 
बनकर निर्झर निर्मल जल का 
बूँद -बूँद बरसना 
हंसी-ठिठोली करते तुम 
प्यारे से बच्चे लगते हो 
सपनों के सृजक सत्य --तुम--
बड़े अच्छे लगते हो --

   ब्लॉगर साथियों नेट की आँख -मिचौनी की  वजह से १ मार्च के लिय़े लिखी गई रचना को आज पोस्ट कर रही हूँ। सत्य  और उसकी सच्चाई के साथ मेरे जीवन के अनुभवों का निचोड़ है इसमें -----